UPSRTC: बार बार नियम व शर्तें बदलकर टेंडर प्रक्रिया पर डाला जा रहा असर?
बरेली व रुहेलखंड डिपो के टेंडर पर पक्षपात के गंभीर आरोप, नियमों में बार-बार बदलाव से बढ़ा संदेह
बरेली। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की टेंडर प्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बरेली और रुहेलखंड डिपो में जारी मरम्मत व रखरखाव से जुड़े टेंडरों की शर्तों को बार-बार बदले जाने को लेकर गंभीर अनियमितताओं की आशंका गहरा गई है। आरोप है कि शर्तों में किए जा रहे बदलाव दोषी फर्मों को लाभ पहुंचाने और टेंडर की दिशा तय करने की मंशा से किए जा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक दोनों डिपो में हाल ही में दो बार टेंडर जारी हुए हैं, और हर चरण में पात्रता, तकनीकी आवश्यकताओं तथा श्रमिक संख्या से संबंधित नियमों में उल्लेखनीय बदलाव किया गया। हैरानी की बात यह है कि सितंबर 2025 के टेंडर में केवल कुशल श्रमिकों की मांग रखी गई थी, जबकि 5 दिसंबर के टेंडर में इसे बढ़ाकर 52 कुशल श्रमिक कर दिया गया। शर्तों में यह बदलाव पूर्व मानकों से न सिर्फ बिल्कुल विपरीत है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि नियम परिस्थिति अनुसार नहीं, बल्कि लाभान्वित करने के उद्देश्य से संशोधित किए गए।
सूत्रों का दावा है कि क्षेत्रीय प्रबंधक और सेवा प्रबंधक स्तर पर कथित रूप से सुविधा शुल्क लेकर पसंदीदा दोषी फर्मों को टेंडर दिलाने की कोशिश की जा रही है, जिससे सरकारी तंत्र में वित्तीय लाभ पहुंचाया जा सके। लगातार जारी बदले हुए टेंडर, पात्रता मानकों की अनियमित व्याख्या और श्रमिक संख्या में अचानक बढ़ोतरी ने पूरी प्रक्रिया की नीयत पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
कर्मचारियों तथा मरम्मत से जुड़े श्रमिकों ने भी असंतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि टेंडर प्रक्रिया में बार-बार की जा रही छेड़छाड़ न केवल पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को खत्म करती है, बल्कि वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी श्रमिकों को असुरक्षा और भविष्य के संकट में भी डाल रही है। कर्मचारियों के अनुसार यदि स्थिति पर अंकुश नहीं लगा तो इसका सीधा असर बसों के संचालन, सुरक्षा और यात्रियों को मिलने वाली सेवाओं पर पड़ेगा।
जानकारों का मानना है कि यदि टेंडर की शर्तें हर बार दोषी फर्मों को लाभ पहुंचाने के अनुरूप गढ़ी जाएं, तो यह स्पष्ट रूप से बिड मैनीपुलेशन और फेवर रिगिंग की श्रेणी में आता है। यह मामला अब निगम की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अब स्थानीय स्तर पर मांग उठने लगी है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की टेंडर प्रक्रिया में वास्तव में नियमों का पालन हो रहा है या फिर किसी व्यवस्थित सांठगांठ के तहत शर्तें तय की जा रही हैं। फिलहाल निगम के वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया है।

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