रोडवेज टेंडर में बड़ा खेल! पाँचवीं बार टेंडर जारी, UPSRTC की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
बरेली। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) की टेंडर व्यवस्था गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। बरेली और रुहेलखंड डिपो में बसों की मरम्मत संबंधी ठेकों को लेकर पिछले कई महीनों से चल रही उठापटक, निरस्तीकरण और कथित अनियमितताओं ने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार बार टेंडर निरस्त होने के बाद निगम ने 5 दिसंबर को पाँचवीं बार नया टेंडर जारी कर दिया, जिससे ठेकेदारों में भारी आक्रोश है।
फॉर्म और ईएमडी की वसूली के बाद टेंडर निरस्त
ठेकेदारों का आरोप है कि हर बार 1180 रुपये का फॉर्म और 50 हजार रुपये की ईएमडी जमा कराने के बाद टेंडर अचानक निरस्त कर दिया जाता है। इससे ठेकेदारों को आर्थिक नुकसान होता है और यह भी संदेह बढ़ता है कि निरस्तीकरण की आड़ में धन उगाही हो रही है।
भ्रष्टाचार के आरोपों ने दागी किया सिस्टम
सूत्रों के अनुसार 31 दिसंबर 2024 के टेंडर में हरदोई की सैनिक इंजीनियरिंग वर्क्स को ठेका मिला था, लेकिन फर्म ने कोई काम शुरू नहीं किया। इसके बाद तत्कालीन सेवा प्रबंधक धनजी राम पर कथित सुविधा शुल्क लेकर बिना नई टेंडर प्रक्रिया के भसीन इंटरप्राइजेज को काम सौंपने के आरोप लगे।
नोडल अधिकारी की जांच में सामने आया कि यही भसीन इंटरप्राइजेज बिना मरम्मत कार्य किए फर्जी बिल लगाकर निगम को लाखों रुपये का नुकसान पहुँचा चुकी है।
15 मिनट में “एक्सेप्ट” से “रिजेक्ट”
12 सितंबर 2025 को जारी टेंडर में बरेली और रुहेलखंड डिपो में 11 फर्मों ने भाग लिया और सभी ने 50000-50000 रुपये की ईएमडी जमा की। इसके बाद निगम की कार्रवाई सबसे ज्यादा विवादित रही, पहले सभी 11 फर्मों को एक्सेप्ट किया गया।
ठीक 15 मिनट बाद सभी को एक साथ रिजेक्ट कर दिया गया और उसके बाद पूरा टेंडर निरस्त कर दिया गया।
निगम ने इस कार्रवाई को लेकर अब तक कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है।
सबसे बड़ा सवाल — जब टेंडर नहीं था तो काम कैसे और किसके द्वारा हुआ?
सूत्रों ने दावा किया है कि पूरे वर्ष टेंडर न होने या निरस्त होने के बावजूद रुहेलखंड और बरेली डिपो में मरम्मत का कार्य भसीन इंटरप्राइजेज ही करती रही, जबकि उसके पास उस दौरान न तो वैध अनुबंध था और न ही प्राधिकृत स्वीकृति।
चहेती फर्मों को बचाने का आरोप
सूत्रों का कहना है कि टेंडर बार-बार रद्द करने का मकसद तकनीकी समस्याएँ नहीं, बल्कि टेंडर शर्तों को विशेष फर्मों के अनुकूल बनाना है। सेवा प्रबंधक और क्षेत्रीय प्रबंधक पर चहेती फ़र्मो को लाभ पहुँचाने के गंभीर आरोप लगे हुए हैं।
निगम मौन, संदेह और गहराया
निगम मुख्यालय व स्थानीय प्रबंधक दोनों की चुप्पी ने ठेकेदारों और कर्मचारियों के बीच चर्चाओं को और तेज कर दिया है। दबी जुबान ठेकेदारों का कहना है कि जब भी टेंडर रद्द होता है तो निगम को इसका कारण सार्वजनिक करना चाहिए। पारदर्शिता की कमी ही संदेह को जन्म दे रही है।
ठेकेदारों ने चेतावनी दी है कि यदि टेंडर निरस्त करने के कारण सार्वजनिक नहीं किए गया। पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो वे कानूनी कार्रवाई करेंगे।
लगातार टेंडर निरस्त होना, बिना अनुबंध काम होता रहना और फर्जी बिलिंग के आरोप—इन सबने स्पष्ट कर दिया है कि रोडवेज की टेंडर प्रणाली में कहीं न कहीं गंभीर गड़बड़ी है।
पाँचवीं बार जारी हुआ नया टेंडर अब निगम की साख पर सीधा सवाल बनकर सामने खड़ा है।

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