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दिन में हाउस अरेस्ट, रात में मुशायरा! सपा नेताओं की ‘संवेदना राजनीति’ पर उठे सवाल, जनता बोली – ये दर्द नहीं, अदाकारी है!

दिन में हाउस अरेस्ट, रात में मुशायरा! सपा नेताओं की ‘संवेदना राजनीति’ पर उठे सवाल, जनता बोली – ये दर्द नहीं, अदाकारी है!


बरेली। शहर में बवाल की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि समाजवादी पार्टी के नेताओं ने संवेदना की राजनीति को भी ‘कला’ का रूप दे दिया। दिन में प्रशासन से टकराव और “हाउस अरेस्ट” की शिकायतें उड़ाने वाले सपा नेता, रात ढलते ही ग़ज़लों की महफ़िल में झूमते नजर आए।

शनिवार को सपा का 14 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल मुस्लिम समुदाय से मुलाकात और अधिकारियों से वार्ता के लिए तैयार था। दिनभर सोशल मीडिया पर सपा नेताओं ने संदेश फैलाए कि उन्हें घर में नजरबंद किया गया है और “लोकतंत्र की आवाज़ दबाई जा रही है।”

लेकिन रात होते ही वही नेता सिविल लाइंस स्थित आईएमए हॉल में आयोजित मुशायरे “एक शाम एकता के नाम” में मंच और माइक के सामने तालियाँ बजाते दिखे।

कार्यक्रम के मेज़बान सपा नेता डॉ. अनीस बेग थे। शायरों की कतार में आरिश रईस, शाश्वत, मणिका दुबे, शारिक कैफ, मध्यम सक्सेना, वसीम नाज़िर, मोहन मुंतज़िर, सलमान सईद और कमल शर्मा ने अपने कलाम से समां बाँधा।

दर्शकदीर्घा में सपा नेता शमीम ख़ां सुल्तानी, शुभलेश यादव, प्रमोद बिष्ट, अशोक यादव सहित कई नेता “वाह-वाह” करते झूमते नज़र आए।

“दिन में कैदी, रात में मेहमान” – जनता के सवाल

सोशल मीडिया पर जैसे ही कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए, लोगों ने तंज कसते हुए लिखा – “दिन में लोकतंत्र के कैदी, रात में महफ़िल के मेहमान!”

कई यूज़र्स ने लिखा कि “जो नेता दिन में बरेली के माहौल को लेकर संवेदना दिखा रहे थे, रात में वही महफ़िलों की रौनक बन गए।”

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सपा नेताओं की यह दोहरी भूमिका जनता में गलत संदेश भेज रही है। “शहर शांति बहाली की ओर बढ़ रहा है, और ऐसे समय में नेताओं की यह चमकदार उपस्थिति जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है,” एक विश्लेषक ने कहा।

राजनीति या रंगमंच?

दिन में गिरफ्तारी की कहानी और रात में शायरी की रवानी — यही समाजवादी पार्टी के नेताओं का नया अंदाज़ बन गया है।

जनता के शब्दों में — “ये दर्द नहीं, अदाकारी है!”


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