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UPSRTC: थाने में खड़ी बस और बेड़े से बाहर बस का बिल सत्यापित करने वाला सीनियर फोरमैन जांच से बाहर क्यों ?

UPSRTC: थाने में खड़ी बस और बेड़े से बाहर बस का बिल सत्यापित करने वाला सीनियर फोरमैन जांच से बाहर क्यों ?


बरेली। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में भ्रष्टाचार थमने का नाम नहीं ले रहा है। भ्रष्टाचार से जुड़े तमाम मामले आए दिन सामने आ रहे हैं। बरेली क्षेत्र की कार्यशालाओ में बीते दिनों जमकर फर्जीवाड़ा कर निगम को राजस्व की क्षति पहुंचाई गई। इस पूरे फ़र्ज़ीवाड़े के पीछे अधिकारी, कर्मचारी और ठेकेदारों की संलिप्त थी, जो की जांच में खुलकर सामने आई। इसी दौरान माह अगस्त 2024 में बस संख्या यूपी 25 बीटी 1990 जोकि सात अगस्त 2024 से 30 अगस्त 2024 तक पुलिस कस्टडी में थी उसके फर्जी बिल बनाकर सत्यापित किए गए। 

वहीं, बरेली डिपो के बेड़े में बस संख्या 0977 शामिल ही नहीं थी उसके भी फर्जी बिल बनाकर सत्यापित किए गए। जांच में साफ हो गया कि जिन बसों का अस्तित्व ही उस अवधि में नहीं था, उनके नंबर से फर्जी बिल बने और सीनियर फोरमैन ने उन पर मुहर लगाई। इसके बावजूद नवाबुद्दीन को जांच से बाहर रखा गया। सूत्रों का कहना है कि उनकी उच्च अधिकारियों से गहरी साठगांठ है, इसी कारण उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

जबकि पूरे मामले में सेवा प्रबंधक सहित 13 लोग दोषी पाए गए थे।

आपको बता दें कि ममता एंटरप्राइजेज ने माह अगस्त 2024 के जॉब वर्क के 700355 रुपए के बिल भुगतान के लिए दिए थे। उन बिलों को क्षेत्रीय स्तर पर चेक करने पर गंभीर अनियमिताएं पाई गई थी। 

डिपो स्तर पर 593521 रुपए के बिल सत्यापित किए गए थे। जब कि क्षेत्रीय स्तर पर चेक करने पर 587526 के बिल उपयुक्त पाए गए थे। इस दौरान 5995 की धनराशि योग में अधिक पाई गई। वहीं पुलिस कस्टडी में खड़ी बस संख्या यूपी 25 बीटी 1990 में 7 अगस्त 2024 से 30 अगस्त 2024 तक 10 बार में 1405 रुपए का काम किया गया। इस बिल को सीनियर फोरमैन के द्वारा सत्यापित भी किया गया था। 

वाहन संख्या 0977 जो की बरेली डिपो के बेड़े में शामिल नहीं थी उसमें भी 23 अगस्त 2024 को 735 रुपए का काम किया गया। इस तरह फ़र्ज़ी बिलों के ज़रिए लंबे समय तक निगम को वित्तीय हानि पहुंचाई गई। 

फिर भी ममता एंटरप्राइजेज को भुगतान कर दिया गया। फर्म का टेंडर निरस्त कर ही महज मामले को ठंडा बस्ते में डाल दिया गया। जबकि निगम को आर्थिक क्षति पहुंचाने के मामले में फर्म को ब्लैक लिस्ट किया जाना चाहिए था। वहीं इस बिल को सत्यापित करने वाले सीनियर फोरमैन के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा न करने पर यह प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। इस पूरे मामले में निगम के कुछ उच्च अधिकारियों से बात की गई तो कोई भी संतोषजनक जवाब देने को तैयार नहीं है। जोकि साफ स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार निगम के अन्य कार्यालयों में भी फैला हुआ है।


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